
अंगुलमावलियाए, भागमसंखेज्जदो वि संखेज्जो।
अंगुलमावलियंतो, आवलियं चांगुलपुधत्तं॥404॥
अन्वयार्थ : प्रथम काण्डक में जघन्य क्षेत्र घनांगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण और उत्कृष्ट क्षेत्र घनांगुल के संख्यातवें भाग प्रमाण है और जघन्य काल का प्रमाण आवली का असंख्यातवाँ भाग तथा उत्कृष्ट काल का प्रमाण आवली का संख्यातवाँ भाग है। दूसरे काण्डक में क्षेत्र घनांगुलप्रमाण और काल कुछ कम एक आवली प्रमाण है। तीसरे काण्डक में क्षेत्र घनांगुल पृथक्त्व और काल आवली पृथक्त्व प्रमाण है ॥404॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका