परमोहिदव्वभेदा, जेत्तियमेत्ता हु तेत्तिया होंति।
तस्सेव खेत्त-कालवियप्पा विसया असंखगुणिदकमा॥416॥
अन्वयार्थ : परमावधि के जितने द्रव्य की अपेक्षा से भेद हैं उतने ही भेद क्षेत्र और काल की अपेक्षा से हैं। परन्तु उनका विषय असंख्यातगुणितक्रम है ॥416॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका