
सव्वावहिस्स एक्को, परमाणू होदि णिव्वियप्पो सो।
गंगामहाणइस्स, पवाहोव्व धुवो हवे हारो॥415॥
अन्वयार्थ : परमावधि के उत्कृष्ट द्रव्यप्रमाण में ध्रुवहार का एकबार भाग देने से लब्ध एक परमाणुमात्र द्रव्य आता है, वही सर्वावधिज्ञान का विषय होता है। यह ज्ञान तथा इसका विषयभूत परमाणु निर्विकल्पक है। यहाँ पर जो भागहार है वह गंगा महानदी के प्रवाह की तरह ध्रुव है ॥415॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका