
भवणतियाणमधोधो, थोवं तिरियेण होदि बहुगं तु।
उड्ढेण भवणवासी, सुरगिरिसिहरो त्ति पस्संति॥429॥
अन्वयार्थ : भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इनके अवधि का क्षेत्र नीचे नीचे कम होता है और तिर्यग् रूप से अधिक होता है। तथा भवनवासी देव अपने अवस्थित स्थान से सुरगिरि के शिखरपर्यन्त अवधि के द्वारा देखते हैं ॥429॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका