जीवतत्त्वप्रदीपिका
कप्पसुराणं सगसग ओहीखेत्तं विविस्ससोवचयं।
ओहीदव्वपमाणं, संठाविय धुवहरेण हरे॥433॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका