सव्वं च लोयणालिं, पस्संति अणुत्तरेसु जे देवा।
सक्खेत्ते य सकम्मे, रूवगदमणंतभागं च॥432॥
अन्वयार्थ : नव अनुदिश तथा पंच अनुत्तरवासी देव संपूर्ण लोकनाली को अवधि द्वारा देखते हैं। अपने क्षेत्र में अर्थात् अपने-अपने विषयभूत क्षेत्र के प्रदेशसमूह में से एक प्रदेश घटाना चाहिये और अपने-अपने अवधिज्ञानावरण कर्मद्रव्य में एक बार ध्रुवहार का भाग देना चाहिये। ऐसा तब तक करना चाहिये, जबतक प्रदेशसमूह की समाप्ती हो। इससे देवों में अवधिज्ञान के विषयभूत द्रव्य में भेद सूचित किया है ॥432॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका