चिंतियमचिंतियं वा, अद्धं चिंतियमणेयभेयगयं।
मणपज्जवं ति उच्चइ, जं जाणइ तं खु णरलोए॥438॥
अन्वयार्थ : चिंतित और अचिंतित और अर्धचिंतित - ऐसे जो अनेक भेदवाले अन्य जीव के मन में प्राप्त हुये अर्थ, उसको जो जाने, वह मन:पर्ययज्ञान है। मन: अर्थात् अन्य जीव के मन में चिंतवनरूप प्राप्त हुआ अर्थ, उसको पर्येति अर्थात् जाने, वह मन:पर्यय है, ऐसा कहते हैं। सो इस ज्ञान की उत्पत्ति मनुष्यक्षेत्र में ही है, बाह्य नहीं है ॥438॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका