जोइसियंताणोहीखेत्ता उत्ता ण होंति घणपदरा।
कप्पसुराणं च पुणो, विसरित्थं आयदं होदि॥437॥
अन्वयार्थ : भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी इनके अवधि के क्षेत्र का प्रमाण जो पहले बताया गया है वह विसदृश है, बराबर चौकोर घनरूप नहीं है, उनकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई का प्रमाण आगम में सर्वथा समान नहीं बताया गया है। तिर्यक् अधिक और ऊर्ध्वाध: कम है। कल्पवासी देवों के अवधि का क्षेत्र आयतचतुरस्र अर्थात् लम्बाई में ऊर्ध्वअध: अधिक और चौड़ाई में अर्थात् तिर्यक् थोड़ा है। शेष मनुष्य तिर्यञ्च नारकी इनके अवधि का विषयभूत क्षेत्र बराबर चौकोर घनरूप है ॥437॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका