
सण्णाणरासिपंचयपरिहीणो सव्वजीवरासी हु।
मदिसुद-अण्णाणीणं, पत्तेयं होदि परिमाणं॥464॥
अन्वयार्थ : पाँच सम्यग्ज्ञानी जीवों के प्रमाण को सम्पूर्ण जीवराशि के प्रमाण में से घटाने पर जो शेष रहे उतने कुमतिज्ञानी तथा उतने ही कुश्रुतज्ञानी जीव हैं ॥464॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका