
वदसमिदिकसायाणं, दंडाण तहिंदियाण पंचण्हं।
धारणपालणणिग्गहचागजओ संजमो भणिओ॥465॥
अन्वयार्थ : अहिंसा, अचौर्य, सत्य, शील , अपरिग्रह इन पाँच महाव्रतों का धारण करना; ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेपण, उत्सर्ग इन पाँच समितियों का पालना; क्रोधादि चार प्रकार की कषायों का निग्रह करना; मन, वचन, कायरूप दण्ड का त्याग; तथा पाँच इन्द्रियों का जय - इसको संयम कहते हैं। अतएव संयम के पाँच भेद हैं ॥465॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका