
बादरसंजलणुदये, सुहुमुदये समखये य मोहस्स।
संजमभावो णियमा, होदि त्ति जिणेहिं णिद्दिट्ठं॥466॥
अन्वयार्थ : बादर संज्वलन के उदय से अथवा सूक्ष्मलोभ के उदय से और मोहनीय कर्म के उपशम से अथवा क्षय से नियम से संयमरूप भाव उत्पन्न होते हैं ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है ॥466॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका