जीवतत्त्वप्रदीपिका
जहखादसंजमो पुण, उवसमदो होदि मोहणीयस्स।
खयदो वि य सो णियमा, होदि त्ति जिणेहिं णिद्दिट्ठं॥468॥
अन्वयार्थ :
यथाख्यात संयम नियम से मोहनीय कर्म के उपशम या क्षय से होता है ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है ॥468॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका