तदियकसायुदयेण य, विरदाविरदो गुणो हवे जुगवं।
विदियकसायुदयेण य, असंजमो होदि णियमेण॥469॥
अन्वयार्थ : तीसरी प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से विरताविरत=देशविरत=मिश्रविरत= संयमासंयम नामका पाँचवाँ गुणस्थान होता है और दूसरी अप्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से असंयम (संयम का अभाव) होता है ॥469॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका