उवसंते खीणे वा, असुहे कम्मम्मि मोहणीयम्मि।
छदुमट्ठो व जिणो वा, जहखादो संजदो सो दु॥475॥
अन्वयार्थ : अशुभ मोहनीय कर्म के उपशान्त या क्षय हो जाने पर उपशान्तकषाय और क्षीणकषाय गुणस्थानवर्ती छद्मस्थ अथवा सयोगी और अयोगी जिन यथाख्यात संयमी होते हैं। समस्त मोहनीय कर्म के उपशम अथवा क्षय से यथावस्थित आत्मस्वभाव की अवस्थारूप लक्षणवाला यथाख्यात चारित्र कहलाता है ॥475॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका