पंचतिहिचहुविहेहिं य, अणुगुणसिक्खावयेहिं संजुत्ता।
उच्चंति देसविरया, सम्माइट्ठी झलियकम्मा॥476॥
अन्वयार्थ : पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत - ऐसे बारह व्रतों से संयुक्त जो सम्यग्दृष्टि, कर्मनिर्जरा के धारक, वेदेशविरती संयमासंयम के धारक हैं ऐसा परमागम में कहा है ॥476॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका