जीवतत्त्वप्रदीपिका
जीवा चोद्दसभेया, इंदियविसया तहट्ठवीसं तु।
जे तेसु णेव विरया, असंजदा ते मुणेदव्वा॥478॥
अन्वयार्थ :
चौदह प्रकार के जीवसमास और अट्ठाईस प्रकार के इन्द्रियों के विषय इनसे जो विरक्त नहीं है, उनको असंयत कहते हैं ॥478॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका