जीवतत्त्वप्रदीपिका
अन्तरभावप्पबहु अहियारा सोलसा हवंति त्ति।
लेस्साण साहणट्ठं जहाकमं तेहिं वोच्छामि॥492॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका