लोगाणमसंखेज्जा, उदयट्ठाणा कसायगा होंति।
तत्थ किलिट्ठा असुहा, सुहा विसुद्धा तदालावा॥499॥
अन्वयार्थ : कषायसंबंधी अनुभागरूप उदयस्थान असंख्यातलोकप्रमाण हैं। उनको यथायोग्य असंख्यातलोक का भाग दीजिये। वहाँ एक भाग बिना अवशेष बहुभागमात्र तो संक्लेशस्थान हैं । वे भी असंख्यात लोकप्रमाण हैं। पुनश्च एक भागमात्र विशुद्धिस्थान हैं। वे भी असंख्यातलोकप्रमाण हैं क्योंकि असंख्यात के भेद बहुत हैं। वहाँ संक्लेशस्थान तो अशुभ लेश्या संबंधी जानने और विशुद्धिस्थान शुभलेश्या संबंधी जानने ॥499॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका