अयदो त्ति छ लेस्साओ, सुहतियलेस्सा हु देसविरदतिये।
तत्तो सुक्का लेस्सा अजोगिठाणं अलेस्सं तु॥532॥
अन्वयार्थ : चतुर्थ गुणस्थानपर्यन्त छहों लेश्याएँ होती है तथा देशविरत,प्रमत्तविरत और अप्रमत्त-विरत इन तीन गुणस्थानों में तीन शुभलेश्याएँ ही होती है। किन्तु इसके आगे अपूर्वकरण से लेकर सयोगकेवलीपर्यन्त एक शुक्ललेश्या ही होती है और अयोगकेवली गुणस्थान लेश्यारहित है ॥532॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका