णट्ठकसाये लेस्सा, उच्चदि सा भूदपुव्वगदिणाया।
अहवा जोगपउत्ती मुक्खो त्ति तहिं हवे लेस्सा॥533॥
अन्वयार्थ : अकषाय जीवों के जो लेश्या बताई है वह भूतपूर्वप्रज्ञापन नय की अपेक्षा से बताई है। अथवा योग की प्रवृत्ति को लेश्या कहते हैं, इस अपेक्षा से वहाँ पर मुख्यरूप से भी लेश्या है, क्योंकि वहाँ पर योग का सद्भाव है ॥533॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका