किण्हादिलेस्सरहिया, संसारविणिग्गया अणंतसुहा।
सिद्धिपुरं संपत्ता, अलेस्सिया ते मुणेयव्वा॥556॥
अन्वयार्थ : जो कृष्ण आदि छहों लेश्याओं से रहित हैं, अतएव जो पंच परिवर्तनरूप संसारसमुद्र के पार को प्राप्त हो गये हैं तथा जो अतीन्द्रिय अनंत सुख से तृप्त हैं, आत्मोपलब्धिरूप सिद्धिपुरी को सम्यक्पने से प्राप्त हो गये हैं, वे अयोगकेवली और सिद्ध भगवान लेश्यारहित अलेश्य जानने॥556॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका