
भविया सिद्धी जेसिं, जीवाणं ते हवंति भवसिद्धा।
तव्विवरीयाऽभव्वा, संसारादो ण सिज्झंति॥557॥
अन्वयार्थ : जिन जीवों की अनंत चतुष्टयरूप सिद्धि होनेवाली हो अथवा जो उसकी प्राप्ति के योग्य हों उनको भव्यसिद्ध कहते हैं। जिनमें इन दोनों में से कोई भी लक्षण घटित न हो उन जीवों को अभव्यसिद्ध कहते हैं ॥557॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका