भव्‍वत्तणस्स जोग्गा, जे जीवा ते हवंति भवसिद्धा।
ण हु मलविगमे णियमा, ताणं कणओवलाणमिव॥558॥
अन्वयार्थ : जो जीव भव्यत्व, अर्थात् सम्यग्दर्शनादिक सामग्री को पाकर अनंतचतुष्टयरूप होना, उसके केवल योग्य ही हैं, तद्रूप नहीं होते हैं, वे भव्यसिद्धिक सदाकाल संसार को प्राप्‍त रहते हैं। किस कारण? - जैसे कई सुवर्ण सहित पाषाण ऐसे होते हैं उनके कभी भी मैल के नाश करने की सामग्री नहीं मिलती, वैसे कई भव्य ऐसे हैं जिनके कभी भी कर्ममल नाश करने की सामग्री नियम से नहीं होती हैं ॥558॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका