जीवाजीवं दव्वं, रूवारूवि त्ति होदि पत्तेयं।
संसारत्था रूवा, कम्मविमुक्का अरूवगया॥563॥
अन्वयार्थ : द्रव्य के सामान्यतया दो भेद हैं - एक जीवद्रव्य, दूसरा अजीव द्रव्य। फिर इनमें भी प्रत्येक के दो-दो भेद हैं - एक रूपी, दूसरा अरूपी। जितने संसारी जीव हैं वे सब रूपी हैं, क्योंकि उनका कर्म पुद्‍गल के साथ एकक्षेत्रावगाह संबंध है। जो जीव कर्म से रहित होकर सिद्ध अवस्था को प्राप्‍त हो चुके हैं वे सब अरूपी हैं, क्योंकि उनसे कर्मपुद्‍गल का संबंध सर्वथा छूट गया है ॥563॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका