
धम्माधम्मादीणं, अगुरुगलहुगं तु छहिं वि वड्ढीहिं।
हाणीहिं वि वड्ढंतो, हायंतो वट्टदे जम्हा॥569॥
अन्वयार्थ : क्रिया का परत्व-अपरत्व तो जीव-पुद्गल में है, धर्मादि अमूर्त द्रव्यों में कैसे संभव है? वह कहते हैं - क्योंकि धर्म अधर्मादि द्रव्यों के अपने द्रव्यत्व के कारणभूत शक्ति के विशेषरूप अगुरुलघु नामक गुण के अविभागप्रतिच्छेद हैं, वे अनंतभागवृद्धि आदि षट्स्थानपतितवृद्धि द्वारा तो बढ़ते हैं और अनंतभागहानि आदि षट्स्थानपतितहानि द्वारा घटते हैं, इसलिये वहाँ ऐसे परिणमन में भी मुख्यकाल ही को कारण जानना ॥569॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका