वत्तणहेदू कालो, वत्तणगुणमविय दव्‍वणिचयेसु।
कालाधारेणेव य, वट्टंति हु सव्‍वदव्वाणि॥568॥
अन्वयार्थ : जो वर्तता है या वर्तनमात्र होते हैं, उसको वर्तना कहते हैं। सो धर्मादिक द्रव्य अपनी-अपनी पर्यायों की निष्पत्ति में स्वयमेव वर्तमान हैं। उनके किसी बाह्य कारणभूत उपकार बिना वह प्रवृत्ति होती नहीं, इसलिये उनके उस प्रवृत्ति कराने को कारण कालद्रव्य है। इसप्रकार वर्तना कालद्रव्य का उपकार जानना। जो द्रव्य की पर्यायें वर्तती हैं उनके वर्तानेवाला काल है ॥568॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका