कालं अस्सिय दव्वं, सगसगपज्जायपरिणदं होदि।
पज्जायावट्ठाणं, सुद्धणये होदि खणमेत्तं॥571॥
अन्वयार्थ : काल का निमित्तरूप आश्रय पाकर जीवादिक सर्व द्रव्य स्वकीय-स्वकीय पर्यायरूप परिणमते हैं। उस पर्याय का जो अवस्थान अर्थात् रहने का जो काल, वह शुद्धनय (ऋजुसूत्रनय) से अर्थपर्याय अपेक्षा एक समयमात्र जानना ॥571॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका