लोगागासपदेसे, एक्केक्के जे ट्ठिया हु एक्केक्का।
रयणाणं रासी इव, ते कालाणू मुणेयव्वा॥589॥
अन्वयार्थ : लोकाकाश के एक-एक प्रदेश में जो एक-एक स्थित हैं तथा रत्नों की राशि में रत्न भिन्न- भिन्न रहते हैं उसके समान भिन्न-भिन्न रहते हैं, वे कालाणु जानने ॥589॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका