
जीवा अणंतसंखाणंतगुणा पुग्गला हु तत्तो दु।
धम्मतियं एक्केक्कं, लोगपदेसप्पमा कालो॥588॥
अन्वयार्थ : जीव द्रव्य अनंत हैं। उनसे अनंतगुणे पुद्गलद्रव्य हैं। धर्म, अधर्म, आकाश ये एक-एक द्रव्य हैं, क्योंकि ये प्रत्येक अखण्ड एक-एक हैं तथा लोकाकाश के जितने प्रदेश हैं उतने ही कालद्रव्य हैं ॥588॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका