
अण्णोण्णुवयारेण य, जीवा वट्टंति पुग्गलाणि पुणो।
देहादीणिव्वत्तणकारणभूदा हु णियमेण॥606॥
अन्वयार्थ : जीव परस्पर में उपकार करते हैं - जैसे सेवक स्वामी की हितसिद्धि में प्रवृत्त होता है और स्वामी सेवक को धनादि देकर संतुष्ट करता है। तथा पुद्गल शरीरादि उत्पन्न करने में कारण है ॥606॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका