णिद्धिदरवरगुणाणू, सपरट्ठाणं वि णेदि बंधट्ठं।
बहिरंतरंगहेदुहि, गुणंतरं संगदे एदि॥618॥
अन्वयार्थ : जघन्य एक गुणयुक्त स्निग्ध या रूक्ष परमाणु स्वस्थान या परस्थान में बंध के लिये योग्य नहीं है। परन्तु वही परमाणु यदि बाह्य अभ्यंतर कारण से दो आदि अन्य अंशों को प्राप्‍त हो जाये तो बंध योग्य होता है ॥618॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका