
णिद्धिदरगुणा अहिया, हीणं परिणामयंति बंधम्मि।
संखेज्जासंखेज्जाणंतपदेसाण खंधाणं॥619॥
अन्वयार्थ : संख्यात, असंख्यात, अनंत प्रदेशों के स्कंधों में स्निग्धगुणस्कंध या रूक्षगुणस्कंध के, जिसके भी दो गुण अधिक होते हैं, वे बंध के होते हुये हीन गुणवाले स्कंध को परिणमाते हैं। जैसे दो स्कंध हैं, एक स्कंध में स्निग्ध या रूक्ष के पचास अंश हैं और एक में बावन अंश हैं और उन दोनों स्कंधों का एक स्कंध हुआ तो वहाँं पचास अंश वाले को बावन अंशरूप वाला परिणमाता है। ऐसे सर्वत्र जानना ॥619॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका