जीवतत्त्वप्रदीपिका
अट्ठेव सयसहस्सा, अट्ठाणउदी तहा सहस्साणं।
संखा जोगिजिणाणं, पंचसयविउत्तरं वंदे॥629॥
अन्वयार्थ :
सयोगकेवली जिनों की संख्या आठ लाख अठानवे हजार पाँच सौ दो
(8,98,502)
है। इनकी मैं सदाकाल वंदना करता हूँ॥629॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका