दंसणमोहुवसमदो, उप्पज्‍जइ जं पयत्थसद्दहणं।
उवसमसम्मत्तमिणं, पसण्णमलपंकतोयसमं॥650॥
अन्वयार्थ : अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ और दर्शनमोह की मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक्‍त्व प्रकृति इन तीन के उदय का अभाव लक्षणरूप प्रशस्त उपशम से मलपंक नीचे बैठ जाने से निर्मल हुए जल की तरह जो पदार्थ का श्रद्धान उत्पन्न होता है उसका नाम उपशम सम्यक्‍त्व है ॥650॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका