
चदुगदिभव्वो सण्णी, पज्जत्तो सुज्झगो य सागारो।
जागारो सल्लेसो, सलद्धिगो सम्ममुवगमई॥652॥
अन्वयार्थ : जो जीव चार गतियों में से किसी एक गति का धारक तथा भव्य, संज्ञी, पर्याप्त विशुद्धि - मंदकषाय रूप परिणति से युक्त, जागृत - स्त्यानगृद्धि आदि तीन निद्राओं से रहित, साकार उपयोगयुक्त और शुभ लेश्या का धारक होकर करणलब्धिरूप परिणामों का धारक होता है, वह जीव सम्यक्त्व को प्राप्त करता है ॥652॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका