चत्तारि वि खेत्ताइं, आउगबंधेण होदि सम्मत्तं।
अणुवदमहव्‍वदाइं, ण लहइ देवाउगं मोत्तुं॥653॥
अन्वयार्थ : चारों गतिसंबंधी आयुकर्म का बंध हो जाने पर भी सम्यक्‍त्व हो सकता है, किन्तु देवायु को छोड़कर शेष आयु का बंध होने पर अणुव्रत और महाव्रत नहीं होते ॥653॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका