ण य मिच्छत्तं पत्तो, सम्मत्तादो य जो य परिवडिदो।
सो सासणो त्ति णेयो, पंचमभावेण संजुत्तो॥654॥
अन्वयार्थ : जो जीव सम्यक्‍त्व से तो च्युत हो गया है किन्तु मिथ्यात्व को प्राप्‍त नहीं हुआ है उसको सासन कहते हैं। यह जीव दर्शन मोहनीय की अपेक्षा पाँचवें पारिणामिक भाव से युक्त होता है ॥654॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका