
मिच्छादिट्ठी जीवो, उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहदि।
सद्दहदि असब्भावं उवइट्ठं वा अणुवइट्ठं॥656॥
अन्वयार्थ : जो जीव जिनेन्द्रदेव के कहे हुए आप्त, आगम, पदार्थ का श्रद्धान नहीं करता, किन्तु कुगुरुओं के कहे हुए या बिना कहे हुए भी मिथ्या आप्त, आगम, पदार्थ का श्रद्धान करता है उसको मिथ्यादृष्टि कहते हैं ॥656॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका