
वासपुधत्ते खइया, संखेज्जा जइ हवंति सोहम्मे।
तो संखपल्लठिदिये, केवडिया एवमणुपादे॥657॥
अन्वयार्थ : क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव सौधर्म-ऐशान स्वर्ग में पृथक्त्व वर्ष में संख्यात उत्पन्न होते हैं तो संख्यात पल्य की स्थिति में कितने जीव उत्पन्न होंगे ? इसका त्रैराशिक करने से क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवों का प्रमाण निकलता है, क्योंकि बहुधा क्षायिकसम्यग्दृष्टि कल्पवासी देव होते हैं और कल्पवासी देव बहुत करके सौधर्म-ऐशान स्वर्ग में ही हैं ॥657॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका