णोइंदियआवरणखओवसमं तज्‍जबोहणं सण्णा।
सा जस्स सो दु सण्णी, इदरो सेसिंदिअवबोहो॥660॥
अन्वयार्थ : नोइन्द्रियावरण कर्म के क्षयोपशम को या तज्‍जन्य ज्ञान को संज्ञा कहते हैं। यह संज्ञा जिसके हो उसको संज्ञी कहते हैं और जिनके यह संज्ञा न हो, किन्तु केवल यथासंभव इन्द्रियजन्य ज्ञान हो उनको असंज्ञी कहते हैं॥660॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका