
मीमंसदि जो पुव्वं, कज्जमकज्जं च तच्चमिदरं च।
सिक्खदि णामेणेदि य, समणो अमणो य विवरीदो॥662॥
अन्वयार्थ : जो पहले कार्य-अकार्य का विचार करे, तत्त्व-अतत्त्व को सीखे, नाम से बुलाने पर आये, वह जीव मनसहित समनस्क, संज्ञी जानना। इस लक्षण से उल्टे लक्षण का जो धारक हो, वह जीव मनरहित अमनस्क असंज्ञी जानना ॥662॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका