
आहरदि सरीराणं, तिण्हं एयदरवग्गणाओ य।
भासमणाणं णियदं तम्हा आहारयो भणियो॥665॥
अन्वयार्थ : औदारिक, वैक्रियिक, आहारक इन तीन शरीरों में से किसी भी एक शरीर के योग्य वर्गणाओं को तथा वचन और मन के योग्य वर्गणाओं को यथायोग्य जीवसमास तथा काल में जीव आहरण अर्थात् ग्रहण करता है इसलिये इसको आहारक कहते हैं ॥665॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका