
विग्गहगदिमावण्णा केवलिणा, समुग्घदो अजोगी य।
सिद्धा य अणाहारा, सेसा आहारया जीवा॥666॥
अन्वयार्थ : विग्रहगति को प्राप्त होने वाले चारों गतिसंबंधी जीव, प्रतर और लोकपूर्ण समुद्घात करनेवाले सयोगकेवली, अयोगकेवली, समस्त सिद्ध इतने जीव तो अनाहारक होते हैं और इनको छोड़कर शेष सभी जीव आहारक होते हैं॥666॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका