वत्थुणिमित्तं भावो, जादो जीवस्स जो दु उवजोगो।
सो दुविहो णायव्वो, सायारो चेव णायारो॥672॥
अन्वयार्थ : जीव का जो भाव वस्तु को (ज्ञेय को) ग्रहण करने के लिये प्रवृत्त होता है उसको उपयोग कहते हैं। इसके दो भेद हैं - एक साकार (सविकल्प), दूसरा निराकार (निर्विकल्प) ॥672॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका