णाणं पंचविहं पि य, अण्णाणतियं च सागरुवजोगो।
चदुदंसणमणगारो, सव्वे तल्लक्खणा जीवा॥673॥
अन्वयार्थ : पाँच प्रकार का सम्यग्ज्ञान - मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय तथा केवल और तीन प्रकार का अज्ञान (मिथ्यात्व) - कुमति, कुश्रुत, विभंग ये आठ साकार उपयोग के भेद हैं। चार प्रकार का दर्शन - चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन अनाकार उपयोग है। यह ज्ञान-दर्शनरूप उपयोग ही संपूर्ण जीवों का लक्षण है ॥673॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका