णाणुवजोगजुदाणं, परिमाणं णाणमग्गणं व हवे।
दंसणुवजोगियाणं, दंसणमग्गण व उत्तकमो॥676॥
अन्वयार्थ : ज्ञानोपयोग वाले जीवों का प्रमाण ज्ञानमार्गणावाले जीवों की तरह समझना चाहिये और दर्शनोपयोगवालों का प्रमाण दर्शनमार्गणावालों की तरह समझना चाहिये। इनमें कुछ विशेषता नहीं है ॥676॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका