
चउ पण चोद्दस चउरो, णिरयादिसु चोद्दसं तु पंचक्खे।
तसकाये सेसिंदियकाये मिच्छं गुणट्ठाणं॥678॥
अन्वयार्थ : गतिमार्गणा की अपेक्षा से क्रम से नरकगति में आदि के चार गुणस्थान होते हैं और तिर्यग्गति में पाँच, मनुष्यगति में चौदह तथा देवगति में नरकगति के समान चार गुणस्थान होते हैं। इन्द्रियमार्गणा की अपेक्षा पंचेन्द्रिय जीवों के चौदह गुणस्थान और शेष एकेन्द्रिय से लेकर चतुरिन्द्रिय पर्यन्त जीवों के केवल मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है। कायमार्गणा की अपेक्षा त्रसकाय के चौदह और शेष स्थावरकाय के एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है ॥678॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका