वेगुव्वं पज्‍जत्ते, इदरे खलु होदि तस्स मिस्सं तु।
सुरणिरयचउट्ठाणे, मिस्से ण हि मिस्सजोगो हु॥682॥
अन्वयार्थ : मिथ्यादृष्टि से लेकर असंयतपर्यन्त चारों ही गुणस्थानवाले देव और नारकियों के पर्याप्‍त अवस्था में वैक्रियिक काययोग होता है और अपर्याप्‍त अवस्था में वैक्रियिकमिश्रकाययोग होता है, किन्तु यह मिश्रकाययोग चार गुणस्थानों में से मिश्रगुणस्थान में नहीं हुआ करता, क्योंकि कोई भी मिश्रकाययोग कहीं भी मिश्रगुणस्थान में नहीं पाया जाता। वैक्रियिककाययोग में एक संज्ञीपर्याप्‍त ही जीवसमास है और मिश्रयोग में एक संज्ञी निर्वृत्त्यपर्याप्‍त ही जीवसमास है ॥682॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका