
आहारो पज्जत्ते, इदरे खलु होदि तस्स मिस्सो दु।
अंतोमुहुत्तकाले, छट्ठगुणे होदि आहारो॥683॥
अन्वयार्थ : आहारककाययोग पर्याप्त अवस्था में होता है और आहारकमिश्रयोग अपर्याप्त अवस्था में होता है। ये दोनों ही योग छट्ठे गुणस्थानवाले मुनि के ही होते हैं और इनके उत्कृष्ट और जघन्य काल का प्रमाण अन्तर्मुहूर्त ही है ॥683॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका