
ओरालियमिस्सं वा, चउगुणठाणेसु होदि कम्मइयं।
चदुगदिविग्गहकाले, जोगिस्स य पदरलोगपूरणगे॥684॥
अन्वयार्थ : औदारिक मिश्रयोग की तरह कार्मण योग भी उक्त प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ ये तीन और सयोेगकेवली इस तरह चार गुणस्थानों में और चारों गतिसंबंधी विग्रहगतियों के काल में होता है, विशेषता केवल इतनी है कि औदारिक मिश्रयोग को जो सयोगकेवलि गुणस्थान में बताया है सो कपाट समुद्घात के समय में बताया है और कार्मण योग को प्रतर तथा लोकपूरण समुद्घात के समय में बताया है। यहाँ पर कार्मण काययोग में जीवसमास भी औदारिकमिश्र की तरह आठ होते हैं ॥684॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका